The English version of the interview is here.

द युवा एकता फाउंडेशन के रिज़ुल कटारिया ने आशा से वार्तालाप की उसकी ज़िंदगी के बारे में, सपनो के बारे में और म्यूज़िक की दुनिया में उसका प्रवेश के बारे में|

रिज़ुल कटारिया ने आशा के पहले रैप ‘I’m THAT Girl’ (मैं वो लड़की हूँ) के तुक लिखे हैं!
(आशा से हुई बातचीत का यह एक हिन्दी संस्करण है)

Audio of interview


हैलो (hello) आशा! 
हैलो (hello) भैया! 

कैसी हो? 
मैं ठीक हूँ, आप कैसे हैं? 

मैं भी बिल्कुल ठीक हूँ| गाने के बाद तुम्हारी ज़िंदगी कैसे एकदम से बदल गई है ना? 
हाँ (हंसते हुए), गाने के बाद बहुत सारे लोगों ने शुभकामनाएँ दी हैं, और सब अच्छी- अच्छी बातें कर रहे हैं… तो बहुत अच्छा लग रहा है| कुछ लड़कियाँ भी हैं जिन्होने मुझे निजी रूप से बधाई दी है (मेसेज) तो उन सबकी समीक्षा देख कर बहुत अच्छा लग रहा है| मैं खुश हूँ कि मेरे गाने से इतने सारे लोग खुश हो रहे हैं और लड़कियाँ प्ररित हो रही हैं| 

तो तुम्हारा सपना है रैपर बनने का? 
जी, मेरा सपना है रैपर बनने का! 

और ऐसा क्यूँ (हंसते हुए)? 
क्यूंकी मुझे लगता है कि रैप के ज़रिए मैं वो सारी चीज़ें लोगों को बता सकती हूँ, समझा सकती हूँ, जो मैं ऐसे बोल कर नहीं कर पाती हूँ… 

तो तुम म्यूज़िक (music) के ज़रिए अपनी बातों को ज़्यादा आसानी से रख पाती हो? 
हाँ, म्यूज़िक (music) के ज़रिए ज़्यादा आसानी होती है, और आज-कल ज़्यादा से ज़्यादा लोग रैप सुनना पसंद करते हैं… 

अच्छा तो यह बताओ कि गाना सुनकर तुम्हे खुद कैसा लग रहा है? 
गाना सुनकर मुझे बहुत मज़ा आ रहा है… 

क्या तुम बेचैन थी गाने के पहले? क्या होगा? कैसे होगा? ये सब सोचकर…? 
हाँ, गाने के पहले मैं बेचैन थी, रेकॉर्डिंग (recording) होने से पहले… “क्या मैं ठीक से गा पाउंगी?” जब पहली बार रेकॉर्ड (record) करना शुरू किया तो मैं एक-दो पंक्तियाँ गा कर, आगे का गाना भूल रही थी, जबकि मैने गाना याद किया था अच्छे से! लेकिन जब हमने दो-तीन बार किया, तब धीरे-धीरे समझ आया, अपने आप पर भरोसा हुआ… और फिर ठीक से हो गया| 

बढ़िया, और तुम्हे कितना समय लगा ये गाना बनाने में? 
जब पहली बार गाना लिखना शुरू कर रही थी, तो मुझे एकदम पीछे जाना पड़ा… अपने अतीत में| वो सारी बातें सोचनी पढ़ी… सब शुरू कैसे हुआ (हंसते हुए) 

तो पूरी ज़िंदगी की मेहनत तुमने इसमे डाल दी? 
हाँ, डाल दी (हंसते हुए)! 

और जब तुम स्कूल या कॉलेज में परीक्षा देने जाती हो, तो उस परीक्षा की बेचैनी ज़्यादा होती है या इस गाने की बेचैनी ज़्यादा थी? 
परीक्षा दिए हुए तो बहुत समय हो गया है… लेकिन फिर भी, जब जाती थी तो थोड़ी बहुत बेचैनी होती थी… पता नहीं प्रश्न क्या होंगे? किस प्रकार के होंगे? तो ऐसे ही इसमे भी था… किस तरह से गाउंगी? क्या पता गाते-गाते कुछ अलग ना हो जाए? बीट (beat) ना छूट जाए… 

स्केटबोरडिंग (skateboarding) में लगा है इतना डर तुम्हे? “यार अब में एक दाव लगाने जा रहे हूँ… जैसे ओली (एक दाव का नाम) करने जा रही हूँ, और अगर मुझसे ना हुआ तो?”
हाँ लगता है, उसमे भी लगता है, लेकिन जब माहौल बन जाता है तो फिर नहीं लगता डर | जैसे कुछ शुरू करो, तो शुरू में लगता है… जाएँ या ना जाएँ… और उसके बाद पार्क का चक्कर लगा लो, फिर बेहतर महसूस होने लगता है, आराम से हो जाता है… 

(आशा, जनवार के नये स्केटेपार्क (skatepark) में | तस्वीर का श्रेय: Matjaž Tančič

तो क्या गाने के साथ भी ऐसा है? एक बार रिदम (rhythm) बन जाए, उसके बाद आसान लगता है? 
एक बार रिदम बन गई और आप लह में आ गये तो फिर रुकना मुश्किल है… 

तो ज़्यादा आसान क्या है? स्केटबोरडिंग या रैप? 
ज़्यादा आसान…? दोनो एक जैसे हैं… 

मेहनत किसमे ज़्यादा लगी तुम्हे? 
स्केटबोरडिंग सीखने में ज़्यादा समय लग गया… 

और तुम्हारा गाना आस-पास के लोगों ने सुना? तुम्हारे परिवार के सदस्यों ने सुना? 
हाँ, मेरे भाई ने सुना है… 

तो क्या कह रहे हैं वो? 
अब तक तो कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है उनकी… पता नहीं क्यूँ ऐसा होता है भाइया और हमारा? जब भी हम साथ होते हैं तो बात नहीं करते | हम घर पर भी रह रहे हैं, पर बात नहीं होती… 

अर्रे…?
हाँ लेकिन हम फोन पर ज़्यादा बात करते हैं| जब वो चले जाते हैं, तब बातें हो जाती हैं… अभी मैने उनसे पूछा भी नहीं है… लेकिन मैं पूछूंगी… अगर वो नहीं बताएँ तो मैं ही पूछ लूँगी!! 

हमें ज़रूर बताना कि उन्होने क्या बोला| और हम यह भी जानना चाहते हैं कि आस-पास के तुम्हारे दोस्तों ने क्या बोला?
हाँ, मेरे दोस्त तो काफ़ी ‘वाह वाह’ कर रहे हैं… कह रहे हैं “यार तूने कैसे कर लिया? इतनी योग्यता कहाँ से आई तेरे अंदर?”

तो तुम एकदम छुपी-रुस्तम निकली?
हाँ, उन्हे लगता नही था कि मैं ऐसा भी कुछ कर सकती हूँ… और एक मेरा दोस्त है दिल्ली से… उसने जब से सुना है रैप, वो अपना लॅपटॉप (laptop) खोल के, नयी-नयी धुनें ढूंड रहा है और मुझे भेज रहा है…

कौन है यह मित्र (हंसते हुए)?
एक है देल्ही से, ई**** (नाम गुप्त रखा गया है) नाम है उसका… तो वो बीट्स (beats) यूटयूब (youtube) में ढूँडने में लगा हुआ है…और मुझे कॉल करके बोल रहा है “तू इसमे भी कर सकती है, ये वाली सुन…” मुझे कॉल पर इतना संज़ह नहीं आ रहा…

यह तो बहुत अच्छी बात है? इतना प्रोत्साहन और शुभकामनाएँ मिल रही हैं!! 
हाँ!!

तो जब तुम्हे ये प्रोत्साहन अपने आस-पास के लोगों से मिलता है, तो ये सुन कर क्या तुम्हारी बेचैनी बढ़ जाती है? क्या तारीफ सुन कर तुम्हारी अपने आप से उमीदें बढ़ जाती हैं ? या फिर जो भी तुम सुन रही हो, उसे शांति से बस अपने आप तक सीमित रखती हो?
जब लोग तारीफ करते हैं, या फिर जैसे की मेरा दोस्त जो मुझे धुन सुना रहा था… तो मैं और उत्साहित हो जाती हूँ, क्यूंकी अगर उन्हे ऐसे लग रहा है कि मैं इतना अच्छा कर रही हूँ, तो मैं और भी अच्छा कर सकती हूँ…

(आशा, जनवार के नये स्केटेपार्क (skatepark) में | तस्वीर का श्रेय: Matjaž Tančič

तो ऐसी कौन-कौन सी बातें हैं जो तुम्हे गाने के ज़रिए लोगों को बतानी है? थोड़ा उसके बारे में मुझे बताओ|
पहला तो लिंग को लेकर बहुत से मुद्‍दे हैं… भेद-भाव होता है, और लड़कियों को बराबरी की हिस्सेदारी और इज़्ज़त नहीं दी जाती| लड़कियों मे इतनी हिम्मत है, कि वो खुद के लिए आवाज़ उठा सकती हैं | बहुत बार ऐसा होता है कि लड़कियों को उनके घर वालों ने कुछ बोल दिया, थोड़ा सा भी तेज़ बोल दिया, तो वो अपनी ज़िंदगी उनके हिसाब से जीने लगती हैं..

ऐसा तुम्हारे साथ भी हुआ है, आशा?
मेरे साथ ऐसा हो सकता था, पर मैने होने नही दिया (हंसते हुए)…

वो तुमने कैसे किया? थोड़ा उसके बारे में मुझे बताओ?
(साथ में हंसते हुए)
स्केटबोरडिंग को ही ले लो| जब मैं स्केटबोरडिंग करना चाहती थी, तो मेरे मा-बाप मुझे माना करते थे| शुरू में तो उन्होने मना नही किया, पर जैसे मुझे थोड़ा समय हुआ करते हुए, तो फिर वो माना करने लग गये| वो इसलिए क्यूंकी गाओं के बाकी लोग उनसे कुछ कुछ बोलते थे…  “आपकी बेटी तो लड़कों के साथ होती है, स्केटबोरडिंग करती है… लड़कियों को ऐसा कुछ नही करना चाहिए… उसे घर पे रखो, खाना-वाना बनवाओ, कुछ सिख़ाओ, कुछ सालों के बाद शादी हो जाएगी तो क्या करेगी…? ऐसे करके! तो शुरू में दिक्कत हुई मुझे, पर मैने उनकी नही सुनी| मम्मी-पापा बोलते भी थे तो मैं वापस बोल देती थी… “आपको लगता है की मैने ऐसा कुछ किया है? या आपने कुछ देखा है?” मैं उनसे यह कहती थी कि “आप बस मुझपे भरोसा रखो, आपको मुझपे भरोसा है या नही?” तो इस तरह से करते-करते, जब मैं थोड़ा बाहर जाने लगी (गाओं से) तो उन्हे मुझपर भरोसा होने लग गया कि मैं कुछ ग़लत नही करूँगी…

और आस-पास के लोगों ने तुम्हारा साथ दिया?
जैसे अगर मैं घर पर हूँ, अकेली हूँ, और तब मम्मी-पापा बोल दें, तो तब तो किसी का साथ नही मिलता था, क्यूंकी घर पे वैसे मम्मी, पापा और मैं ही होते थे…और भैया यहाँ पर होते नही हैं| जब मा बोलती थी तो मैं उन्हे बोलती थी कभी-कभी… “पापा को समझाओ कि ऐसे ही किसी के भी बोलने पर ना मान लिया करें किसी की भी बात…”

(आशा, अपने माता-पिता के साथ, 2016)

आशा, ये सुन कर अच्छा लगा कि तुमने अपनी आवाज़ उठाई, और तुम चाहती हो कि तुम म्यूज़िक के ज़रिए और लोगों की आवाज़ बनो| तुम्हारे आस-पास के इलाक़े में, क्या ऐसी लड़कियाँ हैं, या फिर लड़के हैं, जो तुम्हारे साथ काम करना चाहते हैं, और इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना चाहते हैं?
वैसे अगर मैं गाओं को लेकर बोलूं, तो हाँ, गाओं मैं भी कुछ- कुछ लड़कियाँ हैं, जो मेरे साथ खड़ी हो सकती हैं, और हो रही हैं| अगर कोई बात हो तो वो हुमेशा मेरा साथ देती हैं, सही-ग़लत की समझ रखती हैं| और लड़के…लड़कों का मैं उतना तो नही कह सकती, होंगे लड़के भी, कोई तो होंगे…

तुम्हारे दोस्तों मे से कोई नही है?
मेरे दोस्तों में… एक था, क**** (नाम गुप्त रखा गया है) था… जो बहुत कुछ करना चाहता था| वो ये बोलता था कि मैं business (व्यवसाय) करूँगा… ये करूँगा, वो करूँगा…लेकिन उसे भी अपने परिवार वालों के दबाव में आ कर शादी करनी पढ़ गई…तो वो अब भी कभी मिलता है तो बोलता है “अच्छा है तुम लोग अभी तक अपनी मर्ज़ी से कुछ अच्छा कर रहे हो…” वो बोलता है कभी-कभी “हाँ ठीक है तुम करते रहो…अच्छा कर रहे हो, हमारी तो शादी हो गई, हम तो घर पे रहेंगे, उन्ही (अपनी पत्नी की ओर इशारा करते हुए) को ही देखेंगे..”

आशा, तुमने अभी बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही – कि लड़को की संख्या इस लड़ाई में शायद कम हो…पर अगर तुम उन लड़को को कुछ बता सको… आपकी ज़िंदगी में जो औरतें हैं, उनके साथ तुम किस तरहा से बर्ताव करो? उनको क्या सलाह दोगि, कि अपनी मा, बीवी, या बहन को क्या कहें?
मैं उनकी परिवार मैं जो भी औरतें हैं, मतलब उनकी बीवी या मा, जो भी कोई होंगी…तो उनके लिए मैं ये सलाह देना चाहूँगी कि जैसे आपके सपने होते हैं, आप कुछ करना चाहते हैं, आप अपनी ज़िंदगी में खुश रहना चाहते हो, वैसे ही उनके (औरतों) के अंदर भी वो भावनाए होती हैं… तो आप उन्हे दबाने की कोशिश ना करें, उनका साथ दें उनके सपने पूरे करने में…

यह बहुत महत्वपूर्ण सलाह है जो सबको माननी चाहिए| पर एक श्रेणी और भी है जिसके बारे में मैं बात करना चाहूँगा| जनवार में ‘आदिवासी’ होने का क्या मतलब है?
जनवार में ‘आदिवासी’ होने का मतलब कि ‘आदिवासी’ को छोड़कर, और जो जातियाँ हैं, आप उनके बनाए हुए नियमों के हिसाब से चलेंगे, और आप वो चीज़ नहीं कर सकते जो उनसे ज़्यादा बड़ी है| यानी जैसे कोई नौकरी हो या आपका ज़्यादा नाम (जिस काम से) हो, वो चीज़ें आप नहीं कर सकते| अगर आप वो करने की कोशिश भी करते हैं तो फिर वो (उँची जाती वाले) बुरी बातें फैलाना शुरू कर देते हैं ताकि वो चीज़ वहीं पर रुक जाए…

और अपने इस संघर्ष में, क्या तुमने इस पीढ़ा और दर्द के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाई है?
हाँ, मतलब मैने उनकी सुनी ही नहीं| मैने उनकी बातों पर… वो जो बोल रहे थे, वो जो बातें फैला रहे थे, मैने उनपर ध्यान नहीं दिया| काफ़ी बार ऐसे हुआ जब मुझे बहुत ज़्यादा बुरा लगा बातों को लेकर, मैं एकदम टूट सी गयी थी एक-दो बार तो… ऐसी बातें बोली उन्होने, ऐसी बातें फैलाई… लेकिन फिर उसके बाद मैने हिम्मत जुटाई|  उलरिका (Ulrike) से बात करी और फिर उन्होने मेरी मदद की…

तो क्या आस-पास लोग हैं, लड़के या लड़कियाँ, जो इस अन्याय के खिलाफ अब आवाज़ उठा रहे हैं?
अभी तो काफ़ी बच्चे हैं, कुछ-कुछ मा-बाप भी हैं जो थोड़ा सा इसके खिलाफ होते हैं| पहले बहुत ज़्यादा ऐसे होता है कि वो (उँची जाती वाले) जो बोल रहे हैं, सब उनकी बात मानते और सच समझते, बिना उसकी वजह जाने| तो अभी ऐसे नहीं होता है| अभी बहुत से मा-बाप और बहुत से बच्चे हैं, जो खुद के हक के लिए खड़े हो जाते हैं…

तो तुम्हे लगता है कि धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है?
हाँ, मुझे लग रहा है बदलाव आ रहा है| पहले से लेकर अब तक तो काफ़ी बदलाव है, जितना मैने देखा है…

और तुम अपने आप को इस लड़ाई में कहाँ देखती हो? क्या तुम चाहोगी तुम आगे खड़ी रह कर बदलाव ज़िम्मेदारी उठाओ? या तुम चाहोगी “नहीं, मैं यहाँ से बाहर निकलूं और लड़ाई कोई ना कोई करता रहेगा?”
नहीं, यहाँ से बाहर निकलने का तो बिल्कुल भी नहीं सोचती मैं| बल्कि मैं यह सोचती हूँ कि मैं यहीं पर रहूं और ज़्यादा नहीं तो कम से कम लोगों को इतना जागरुक कर सकूँ कि वो खुद के हक के लिए खड़े हो पाएँ…

और तुमने इसके बारे में रैप भी किया है, है ना?
जी!

चलो, अब मुझे अपने बारे में कुछ बताओ… तुम काफ़ी देशों में गई हो… तुमने गाने में भी बताया है कि तुम लंडन गई हो, चीन (China) गई हो…तो और कहाँ-कहाँ गई हो तुम?
मैं लंडन, चीन (China) गई हूँ… वहीं गई हूँ देश (भारत) से बाहर तो..

(आशा, स्केटबोरडिंग की अंतराष्ट्रिया शृंखला में, नानजिंग, चीन)

और इंडिया मीं कहाँ-कहाँ घूमी हो?
इंडिया में…बनारस गई थी मैं एक बार, एक दिन के लिए बस शूटिंग के लिए… और बंगलोर (Bangalore) की तरफ है प्रोटो (proto) गाओं, वहाँ… विशाखापट्नम, ओधिशा (Odisha), और राजस्थान, जयपुर की तरफ… और बस इतना ही….

तो एक बात बताओ… बचपन में तुमने कभी सोचा था या तुम्हारा कभी सपना था बहुत सारी जगाएँ घूमने का? और क्या तुम्हारा ऐसा कोई सपना है जो यहाँ जाकर पूरा हुआ हो?
वैसे जब मैं छोटी थी, तब मुझे पता नही था कि सच में ऐसे होगा| मेरे अंदर वो इच्छाएँ होती थी, लेकिन मैं कभी उन्हे बाहर नही लाती थी, बोलती नही थी किसी से..

बोलने से डर लगता था पहले (हंसते हुए)?
हाँ, बहुत डर लगता था… (हंसते हुए)

अब तो नही लगता?
नहीं अब तो बिल्कुल नही…मेरे अंदर जो चीज़ें रहती थी, शायद उनको मैने कभी मरने नही दिया… भले किसी से बोला नही मैने, पर उन्हे मैने अपने अंदर ज़िंदा रखा… समय आता गया और वो पूरी होती गई…

(देखिए आशा पर बनी एक वत्तचित्र एन. डी. टी. वी. पर, 2016)

तो आशा मुझे ये बताओ कि तुम्हारी इन यात्राओं ने तुम्हे कैसे बदला है?
मैने गाओं से बाहर कदम रखा… पहली चीज़ तो थी कि गाओं से कभी बाहर ही नही गई थी, तो डर तो था ही, पर बाहर जाकर वो डर ख़तम हो गया… और ये समझ मे आने लगा कि बाकी लोग भी हमारी तरह ही होते हैं… भले ही वो गाओं के बाहर से हैं| उनसे बात भी कर सकते हैं, और ज़रूरी नही है कि हर कोई खड़ूस ही हो| हिम्मत आई है कि मैं अकेले भी बाहर जा सकती हूँ, और मेरे साथ साथ और लड़कियों को भी कहीं भी लेकर जा सकती हूँ, आराम से…

बहुत ही बढ़िया बात कही तुमने, आशा… तुममें आत्मविश्‍वास आ गया है कि तुम अपने साथ-साथ और लोगों को भी लेकर जा सकती हो…तो इसी को ध्यान में रखते हुए मुझे बताओ… तुम ‘विला जनवार’ में क्या करती हो?
‘विला जनवार’ में अभी सुबह बच्चों के साथ काम करती हूँ… और उसके साथ में कंप्यूटर्स ‘विला जनवार’ में हैं… तो मैं लड़कियों को वो कंप्यूटर्स चलना सीखती हूँ| अभी मैं एक योजना बना रही हूँ कि शनिवार और रविवार को एक समय  ऐसा हॉएगा, शाम में, जब सारी लड़कियाँ साथ में बैठें, और उसमें हम अपने बारे में बातें करें, सबके साथ| कोई समस्या हो या फिर कोई अच्छी बात, कुछ भी हो सकता है|

(आशा, बच्चों के साथ, विला जनवार में काम करते हुए)

तो सुरक्षित वातावरण बनाने के लिए एक मुहिम है?
हाँ!

तो इसे तुम्हारे उभरते हुए विश्‍वास का एक पहलू के सकते हैं? तुम सबको साथ लेकर चलना चाहती हो?
हाँ!

तो ये बताओ कि तुम्हे अपने इन विद्यार्थियों में क्या एक नयी आशा दिखती है? अपनी जैसी कोई? तुम इन बच्चों में क्या देखती हो? कोई ऐसी बात जो तुम्हे आशा दे?
हाँ, दो लड़किया हैं…एक पूर्ति है, और एक शांति है| पूर्ति में तो काफ़ी बदलाव आ रहा है… पहले तो वो बोलती भी नही थी और अब वो जिस तरह से चीज़ों को सीख रही है… उसे देखकर मुझे बहुत अच्छा लगता है, और मुझे लगता है कि शायद ये आगे जाकर अच्छा करेगी, और साथ में और भी लड़कियों को लेकर चलेगी| वो जब भी यहाँ आती है तो वो अकेली नही आती है, एक-दो को लेकर ही आती है अपने साथ में| और दूसरी है शांति| वो हुमेशा अच्छी बातें ही बोलती है…  और बाकी लड़कियों के बारे में सोचती है| उसके भाई भी हैं… तो वो उनके बारे में भी सवाल उठती है… जो वो बोल रहे हैं वो शायद सही ना हो… तो मुझे लगता है वो भी कुछ करेगी, वो ऐसे चुप नही बैठने वाली है!

आशा, मुझे तुम्हारी बातों में एक कढ़ी नज़र आ रही है… जैसे तुम्हारे सामने परेशानियाँ थी, पर तुमने अपनी कोशिश जारी रखी, और अब तुम ऐसा वातावर्ण बना रही हो लड़कियों के लिए, जिससे वो अपनी बातें आगे रख सकें और निडर होकर काम कर सकें… तो ये कढ़ी मुझे बहुत पसंद आई| मुझे इसी के बारे में कुछ बताओ… तुम्हारी ज़िंदगी में, तुम्हारी माँ का तुम पर क्या प्रभाव रहा है?
माँ ने तो मुझे बहुत सहारा दिया है| जो मेरे दादा जी है, वो हुमेशा बोलते रहते थे, ‘मेरी शादी करनी है, मैं बड़ी हो रही हूँ और मेरे भाई की भी शादी करनी है…’ तो माँ ने उनको एकदम से ये नही बोला कि शादी नहीं करेंगे…  उन्होने धीरे-धीरे समझाया ताकि घर में शांति का माहौल बना रहे, और कुछ बात बिगड़े भी ना… वो धीरे-धीरे बोलती थी… जैसे मैं स्कूल जाती, तो वो परिवार वालों को बोलती थी – “स्कूल जा रही है, इतना पढ़ाई कर ली है तो आगे और कर लेने दो… अभी नवी कक्षा में है… तो उसे नवी के पेपर (परीक्षा) दे लेने दो, उसके बाद देख लेंगे!” ऐसे करते-करते वो समय को हुमेशा बढ़ाती रहती थी…

(आशा के दादाजी)

तो एकदम सहज रूप से एक पेचीदे मामले को उन्होने संभाला?
हाँ-हाँ!

तो आशा ये जो तुम्हारी मा ने किया है तुम्हारे लिए, तो क्या तुम वही सीख आगे बढ़ाती हो? ख़ासकर के उन्न परिवारों के साथ, जिनके बच्चे ‘विला जनवार’ में आते है… ताकि उन्न बच्चों के मा-बाप भी गुस्सा ना हो, और बच्चे भी अपना काम करते रहें…?
मैं पक्का तो नही बता सकती के मैने एकदम वैसा ही किया है… लेकिन हाँ, मैं कोशिश पूरी करती हूँ कि उनके परिवार वालों को कुछ बुरा ना लगे, या उन्हे ये ना लगे के उनकी लड़कियाँ अगर यहाँ पर आती हैं तो मैं उनका ये समय बर्बाद कर रही हूँ| उन्हे भी लगे कि लड़कियाँ कुछ सीख रही हैं| तो मैं हमेशा प्रयास करती हूँ के घरवाले खुश रहें, अपनी बेटियों को भेजते रहें, और लड़कियों को भी कुछ सीखने को मिलता रहे|

जब भी मैं तुम्हारे सफ़र के बारे बात करता हूँ, तो यह सोचता हूँ कि तुम्हारा सफ़र एक प्रेरणासोत्र है…आशा तुम अभी कितने साल की हो?
21 (इक्कीस)

और ये जो बदलाव तुम्हारी ज़िंदगी मैं आए हैं, पिछले कितने सालों में आए हैं? स्केटेपार्क (skatepark) से लेकर अब तक, कितने साल हो गये?
मतलब मैं सोलह (16) साल की थी जब मैने स्केटबोरडिंग शुरू की|

तो मतलब 5-6 (पाँच-छै) साल? तो इसके आगे क्या? अगले पाँच सालों में या 10 सालों में, तुम अपने आप को कहाँ देखती हो? क्या करता हुआ देखती हो?
मैं अगले कुछ सालों में खुद को ऐसे देखती हूँ कि मैं सिर्फ़ मैं नही, मेरे साथ में और भी हैं… और हम सब मिल के कुछ तो धमाकेदार कर रहे हैं…

धमाकेदार माने (हंसते हुए)?
धमाकेदार माने कुछ बड़ा… (हंसते हुए)

तो सबके साथ मिल कर कुछ धमाकेदार करना चाहती हो?
हाँ!

चलो ये मैं तुम पर छोड़ता हूँ कि वो धमाकेदार चीज़ क्या है, और वाहा तक पहुँचने में कितना समय लगेगा… पर आशा, एक निजी सवाल… क्या कोई ऐसी चीज़ है जिससे तुम्हे डर लगता है? क्यूंकी सपने बहुत सारे हैं, आगे बढ़ना है, तो क्या कोई ऐसी चीज़ है जिससे तुम्हे डर लगता है? और अगर हाँ, तो उसका समाधान कैसे निकाला जाए? उसे दूर कैसे किया जाए?
अगर मैं कहूँ… अभी के लिए तो मुझे ऐसी कोई चीज़ दिख नही रही है जिससे मैं बहुत ज़्यादा डरती हूँ…. मैं खुद पर विश्‍वास रखती हूँ, भरोसा रखती हूँ कि अगर कभी भी कोई परेशानी आती है, तो मुझमे उसका सामना करने की हिम्मत है!

वाह, ये तुमने बहुत बड़ी बात कही है! मतलब जब भी कोई परेशानी आएगी, तुम्हे भरोसा है कि तुम निडर होकर उसका सामना करोगी?
हाँ!

आशा, अच्छा लगा तुम्हारे विचार सुनकर, और मैं चाहता हूँ कि जब तुम अगला गाना लिखो, तो ये सारे विचार उमड़-उमड़ कर उसमे आएँ, और तुम बहुत सारे गाने लिखो, और अपना रैपर बनने का सपना पूरा करो…
ओके (Okay) भैया थैंक यू (शुक्रिया)!

शुक्रिया आशा! मुझे इसलिए भी खुशी हो रही है, क्यूंकी मैं जानता हूँ कि ये बातें आगे भी जाएँगी, तो हो सकता है कि कोई और कहीं बैठा हो, जिसको कोई परेशानी आ रही हो ज़िंदगी में, वो तुम्हारी बातें सुनकर शायद  प्रेरित हो जाए…
धन्यवाद (थैंक यू) भैया…

One thought to “I’m THAT Girl (Hindi Interview)”

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